विंध्यवासिनी स्तोत्र



विंध्यवासिनी स्तोत्र

खड्ग-शूल-धरां अम्बां, महा-विध्वंसिनीं रिपून्।

कृशांगींच महा-दीर्घां, त्रिशिरां महोरगाम्।।

स्तम्भनं कुरु कल्याणि, रिपु विक्रोशितं कुरु।

ॐ स्वामि-वश्यकरी देवी, प्रीति-वृद्धिकरी मम।।

शत्रु-विध्वंसिनी देवी, त्रिशिरा रक्त-लोचनी।

अग्नि-ज्वाला रक्त-मुखी, घोर-दंष्ट्री त्रिशूलिनी।।

दिगम्बरी रक्त-केशी, रक्त पाणि महोदरी।

यो नरो निष्कृतं घोरं, शीघ्रमुच्चाटयेद् रिपुम्।।

फलश्रुति

इमं स्तवं जपेन्नित्यं, विजयं शत्रु-नाशनम्।

सहस्त्र-त्रिशतं कुर्यात्। कार्य-सिद्धिर्न संशयः।।

जपाद् दशांशं होमं तु, कार्यं सर्षप-तण्डुलैः।

पञ्च-खाद्यै घृतं चैव, नात्र कार्या विचारणा।।

।।श्रीशिवार्णवे शिव-गौरी-सम्वादे विभीषणस्य रघुनाथ-प्रोक्तं शत्रु-विध्वंसनी-स्तोत्रम्।।

श्री सद्गुरुचरर्णार्पणमस्तु l श्री स्वामी समर्थ महाराज की जय ll

महत्त्वाची सुचना... 

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