आत्मक्रिया योग व सहज समाधि प्रबोधन: संतांच्या दुर्लभ माहिती SEO

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रविवार, ३० ऑगस्ट, २०१५

संतांच्या दुर्लभ माहिती


संत श्री गोरा कुंभार ( click here )


गोरा कुंभार यांचे प्रत्येक काम विठ्ठलाचे नाम स्मरणात चालत असे. त्यावेळी ते अत्यंत तल्लीन होऊ न जात असे. मग ते काम कोणतेही असो. जसे माती तुडविणे चाकावर मातीच्या गोळ्याला आकार देणे व भट्टी लावणे. ही सर्व कामे ते विठ्ठलाचे नाम स्मरणातच करीत असत.
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संत श्री गाडगे महाराज ( click here )
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महाराजांनी बकरी, कोंबडी बलीची प्रथा नष्ट केली. अंधश्रध्देवर आसूड ओढले. महाराजांना स्वच्छता खूप आवडत असे. कोठेही गेले की ते स्वतः तेथील सर्व आसमंत झाडून स्वच्छ करत. तेथेच मुक्काम व रात्री कीर्तन होत असे. महाराज समाजसुधारक संत होते.
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संत श्री गगनगिरी महाराज ( click here )
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प्रत्याहार म्हणजे कशाचाही मोह न पडता निर्लेप असणे, शब्द-स्पर्श-रुप-रस-गंधांच्या संवेदनांनी मोहरा आत वळवणे. प्रत्याहार हेच आपल्या योगप्रवासाचे रहस्य असे महाराज म्हणत.
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संत श्री कलावती आई( click here )
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परमार्थात आईंनी नियमीत उपासनेला महत्त्व दिले आहे. आपला जठराग्नी विशिष्ट वेळेला जेवणाची वाट बघतो. निद्रादेवी जशी विशिष्ट वेळेला येते त्याप्रमाणे श्री हरी देखील आपली वाट बघत असतो म्हणून नियमीत आणि विशिष्ट वेळेच्या उपासनेचे आणि सामुहिक उपासनेचे महत्त्व विशेष असते हे पटवून दिले.
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श्री संत कबीर( click here ) 
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 साधकाच्या अंतःकरणांतील अहंकाराची ( म्हणजे मीपणाची ) भावना दूर झाल्यावरच ईश्वराची प्राप्ती होते. जो पर्यंत मी पणा जात नाही तो पर्यंत ईश्वराची प्राप्ती होत नाही, ईश्वराची प्रेमानेच प्राप्ती होते.
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श्री गजानन महाराज शेगांव( click here ) 
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श्री महाराजांचे ठिकाणी भेदभाव नव्हता तर पूर्ण समता होती. अठरापगड जातीवर त्यांनी कृपा केलेली आहे. त्यांना जो अनन्य भावे शरण जातो. त्यांची सर्व संकटे बाबा आपल्या जीवावर ओढून घेतात व शरणागतांना दुःख मुक्त व चिंता मुक्त करतात.
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संत कान्होपात्रा ( click here ) 
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'पांढुरंग माझा स्विकार करील काय?' त्यावर वारकरी म्हणाला, 'विठ्ठला जवळ जाती, पंथ स्त्री-पुरुष हा भेद नाही'.
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सद्गुरु श्री जंगली महाराज ( click here ) 
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महाराज हे योगातील अधिकारी पुरुष होते. कृष्णेला पुर आला म्हणजे त्यावर घोंगड टाकुन व त्यावर बसुन पैलतीरावर जात असत.
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संत श्री गणेशगिरी महाराज ( click here )
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त्यांचे वास्तव्य दिल्लीतील एका पिंपळाच्या झाडाखाली होते. कोणाशीही न बोलता ते आपल्याच तंद्रीत होते. म्हणुन त्यांना लोक वेडे समाजू लागले. काही लोकांनी त्यांना दगड मारण्याचा प्रयत्न केला आणि चमत्कार म्हणजे त्यांच्या दिशेने फेकलेले दगड हवेत तरंगत राहिले व नंतर बाजुला पडायचे. एकही दगड त्यांना लागला नाही.
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संत श्री उपासनी महाराज ( click here )
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वयाच्या तेराव्या चौदाव्या वर्षी बरेच दिवस अन्नपाण्याशिवाय एका कपारीत राहुन त्यांनी तपश्चर्या केली.
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संत दत्तचिले महाराज ( click here )
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त्यांचे अवतार कार्य संपल की, सर्वांना त्यांची जाणीव होऊ लागते.
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प्रज्ञा चक्षु संत श्री गुलाबराव महाराज ( click here ) 
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केवळ ९ व्या महीन्यातच त्यांचे चर्मचक्षू बंद पडले पण त्याच वेळी त्यांचे 'ज्ञानचक्षू उघडले गेले. वयाच्या केवळ १९ व्या वर्षी त्यांनी लोकांकडुन ग्रंथ वाचवुन घेण्याकरीता अथक परिश्रम घेतले. त्याच वेळी त्यांचे ठिकाणी दैवी गुणांचा उदय होऊन सर्वज्ञता प्राप्त झाली.
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संत श्री गणोरे महाराज ( click here )
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'ॐ हा गुरु' हा ग्रंथ लिहुन अज्ञ.जनांस व परमार्थात गती ऋसलेल्या लोकांस आईच्या मायेने बोट धरुन मार्ग दाखवला. परमार्थ ज्ञान म्हणजे स्वरुप बोध होऊन मुक्ती मिळणे सहज शक्य आहे हे पटवून दिले.


'ॐ हा गुरु' या ग्रंथात त्यांनी परमार्थाक वाटचाल सोपी करुन सांगितली आहे.
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संत श्री कूर्मदास महाराज ( click here )
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  "आता पांडुरंगाचे दर्शन आपल्या नशिबी नाही." तो अतिशय कळवळून विठ्ठलाचा धावा करु लागला. देवा करीता रडू लागला. तेवढ्यात एकाएकी एक दिव्य प्रकाशझोत त्यांच्या समोर पडला व त्यांतील ज्योत सरकत सरकत पुढे आली व तेथे त्या ज्योतीतून एक सगुण-साकार मूर्ती निर्माण झाली. कूर्मदासांनी ओळखले की पंढरपूरचा पांडुरंगच आता आपल्या भेटीला आलेला आहे.
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संत श्री काशीकर महाराज 
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श्री काशिकर महाराज त्रिकाळज्ञानी व अंतर्यामी होते.
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संत श्री आनंदनाथ महाराज 
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स्वामींनी घशातुन पादुका काढल्या त्या आनंदनाथांच्या ओंजळीत पडल्या.
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संत श्री अखंडानंद स्वामी 
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ईश्वरीकृपा म्हणजे या झोपेतच त्यांना श्री वासुदेवानंद सरस्वती थोरले स्वामीं महाराजांचे दर्शन झाले. त्यांना गुरुपदेश मिळाला. काहीतरी उणीव असलेले जीवन अर्थपुर्ण झाले.
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संतश्रेष्ठी श्री एकनाथ महाराज ( click here )
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एक दिवस गुराख्याने नाथांना अशी तपश्चर्या करताना पाहून मोठे आश्चर्य वाटले. तो रैज चरवीभर दुध आणुन नाथांना द्यायचा एके दिवशी दुध घेऊन येत असताना गुराख्याने बघितले कि , एक नाग नाथांच्या कमरेला मिठी मारुन त्यांच्यावर शरीराला विळखे देत आपल्या फण्याची सावली नाथांच्या मस्तकावर धरली होती. तो गुराखी घाबरला व नाथांना आवाज देऊ लागला. नाथांनी डोळे उघडताच नागाने विळखा सैल करुन येथून चुपचाप निघून गेला.
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संत श्री जनार्दन स्वामी महाराज  ( click here )   
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रोज ज्ञानेश्वरी वाचन, ईश्वरोपासना व दर गुरुवारी शुलभंजन पर्वतावर जात. तेथे साक्षात दत्तात्रय महाराज दर्शन देत असत. आपले प्रिय शिष्य संत एकनाथांना त्यांनी तेथेच साधना करायला शिकवले.
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संत श्री संताजी महाराज जनगाडे ( click here )
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तेली समाजाने दिलेला एक महान संत म्हणजे संताजी महाराज जनगाडे.
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श्री नारायण महाराज गोंदेकर ( click here )
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ज्योतिषीशास्त्राचा यांचा गाढा अभ्यास होता. उत्कृष्ट ज्योतिष म्हणून त्यांचे नाव होते. पण त्यांनी तपश्चर्या व गुरुसेवेला प्राधान्य दिले व गुरुकृपेचा प्रसाद मिळवला.
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संत श्री परीसा भागवत ( click here ) 
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श्री क्षेत्र पंढरपूर येथे एक ब्राह्मण रहात असे. त्याचे नाव होते भागवत. तो रुक्मिणी भक्ती करत असे. त्याच्या त्या भक्तीवर प्रसन्न होऊन रुक्मिणी मातेने त्याला एक परिस दिला तेव्हापासून तो परीसा भागवत नावाने ओळखला जाऊ लागला.
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श्री गोरक्षनाथ महाराज
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श्री गोरक्षनाथ यांच्यावर गोरखबनी, सिद्ध सिद्धांतपद्धती, अमनस्कयोग, विवेक मार्यंड, गोरक्षबोध गोरक्ष शतक आदी ग्रंथ प्रसिद्ध झाले.
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भक्तराज श्री जादवजी महाराज यांचे जीवन वृत्तांत 
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मुंबई सारख्या धावपळीच्या शहरामध्ये हजारो लोकांमध्ये 'श्री कृष्णःशरणं मम' अशा प्रवचनाने बुद्धीशाली वर्गाला भक्तीच्या मार्गाने आणि ब्रिटिश सरकारची स्वार्थी प्रवृत्ती असणार्या लोकांचा सामना करीत दारुमुक्ती देणारे भक्तराज श्री जादवजी त्यांच्या कारकिर्दीत प्रसिद्ध झाले. कारण की, मुंबई शहर हे त्यांच्यासाठी अज्ञान होते. तेथील वातावरणातून धर्माच्या मार्गावर नेणारे ते प्रथम व्यक्ती होते. श्री जादवजी महाराज स्वतः ब्राम्हण असुनही त्यांनी जातीभेद मिटविण्याकरीता पुष्कळ परिश्रम घेतले. ही हकीकत गांधीजींच्या कार्यकाळाच्या आधीची व नोंद घेण्यासारखी होती.
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संत ताई महाराज
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जगाच्या कल्याणा संतांच्या विभुती" असे म्हटल्या जाते. खरे तर वारुताईंचा जन्म त्याकरीताच होता. म्हणूनच विधात्यानेच त्यांचे पाश एक एक करुन मोकळे केले. वयाच्या केवळ तेराव्या वर्षीच वैधव्यपण नशीबी आले! वारुताई आता विधवा म्हणून वावरु लागल्या.
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जगत् गुरु संत तुकाराम महाराज
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 तुकोबा निर्गुणाने कधीच रमले नाहीत. त्यांना सगुणांतच गोडी व आनंद वाटायचा. त्यामुळेच ते म्हणतात. आम्ही मोक्षपद तुच्छ मानले आहे कारण आम्हाला भगवत चिंतना करिता पत्येक युगांत जन्म घ्यायचा आहे. हरी विषयीचा हा भक्ती रस अविट आहे, आनंदरुप आहे. पुन्हा पुन्हा त्याचेच सेवन करावेसे वाटते. निर्गुण निराकार देवाला सगुण साकार होण्यास आम्हीच आमच्या भक्तीच्या बळावर भाग पाडले आहे. आता पुन्हा त्याला आम्ही निर्गुण-निराकार होऊ देणार नाही.
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हजरद ताजुद्दीन बाबा
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वेडयांच्या इस्पितळात लोक त्यांच्या दर्शनासाठी येत. त्यानंतर इस्पितळातून सुटून ते कामठी येथे लोककल्याणासाठी आपले संपूर्ण आयुष्य वेचले. दीनदुबळ्यांची उपेक्षितांची सेवा केली. त्यांना योग्य मार्ग दाखविला, आणि याच ठिकाणी आपल्या कार्याची समाप्ती करित समाधीस्थ झाले.
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राष्ट्रसंत श्री तुकडोजी महाराज
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संत तुकडोजी महाराज हे विदर्भातील अमरावती जवळच्या यावली गावी जन्मले. ते ठाकूर घराण्यातील होते. विदर्भात अनेक संत होऊन गेले. पण तुकडोजी महाराज फार अलिकडच्या काळातील होते.
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  प. पू. आक्काताई वेलणकर
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आक्का गुरुंच्या चरणावर नतमस्तक झाल्या. घरी परतल्या. नियमांचे पालन सुरु होते. त्यांनी क्रोधावर विजया मिळविला होता. पुढे आठच महिन्यांनी सन १९५७ मध्ये त्या स्वतःहून इंदूरला गेल्या व जिजी महाराजांचे कडून अनुग्रह प्राप्त करुन घेतला.
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